बिलासपुर, 9 सितंबर 2026: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि निजी धार्मिक संस्थाओं को वैधानिक अदालत की तरह किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति तय करने का अधिकार नहीं है। ऐसे संस्थानों द्वारा दिए गए फैसले कानूनी अदालत के आदेश का विकल्प नहीं हो सकते।
क्या है मामला?
यह मामला रायपुर की एक महिला की याचिका से जुड़ा था। महिला ने रायपुर स्थित एक इदारा-ए-शरिया इस्लामी संस्था द्वारा जारी उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे अपने पति से तलाकशुदा घोषित किया गया था।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि धार्मिक संस्थाएं अपने समुदाय को धार्मिक सलाह या राय दे सकती हैं, लेकिन उनके पास वैधानिक अदालत की तरह विवाह समाप्त करने या किसी व्यक्ति की कानूनी वैवाहिक स्थिति बदलने की शक्ति नहीं है।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
अदालत ने कहा कि देश की न्याय व्यवस्था में निजी धार्मिक संस्थाएं समानांतर अदालत के रूप में काम नहीं कर सकतीं। ‘शरिया कोर्ट’ या ‘दारुल कजा’ जैसे निजी धार्मिक मंचों के निर्णय अपने आप में वैधानिक न्यायिक आदेश नहीं माने जा सकते।
हालांकि, कोर्ट ने तलाक-ए-हसन की संवैधानिक वैधता पर कोई फैसला नहीं दिया। मामले में मुख्य सवाल निजी धार्मिक संस्था के पास वैधानिक न्यायिक अधिकार होने का था।
फैसले का महत्व
इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि किसी व्यक्ति की कानूनी वैवाहिक स्थिति में बदलाव सक्षम अदालत और लागू कानून के तहत निर्धारित प्रक्रिया से ही किया जा सकता है।
संक्षेप में: धार्मिक संस्था सलाह दे सकती है, लेकिन कानूनी तलाक का आदेश देने वाली वैधानिक अदालत की भूमिका नहीं निभा सकती।
